Wednesday, 16 August 2017

"क्षितिज केवल भ्रम है"

            एक बार धरती और अंबर के बीच संवाद हुआ, धरती ने कहा कितनी सदियां बीत गई न हमें साथ चलते चलते।
            दोनों चलते रहे समानांतर, कभी आसमां झुका, कभी बरसा, कभी शीतलता को तरसा। कभी धरती बनी पर्वत, घाटी ,कभी ऊंचे पेड़ों के जरिये मिलन को बढ़ी। पर सदियों यूँही साथ साथ चलते समर्पण का अटूट संबंध निभाते रहे।
            एक दिन पर्वत की चोटी पर झुके अंबर से धरा ने कहा सुनो इंसानों को बतियाते सुना है जिस ओर से भी देखो धरती अंबर मिलते हुए नज़र आते हैं। पर हम दोनों तो एक ही हैं शाश्वत सत्य तो यही है, हमारे बीच ही समाहित है हमारे अनंत प्रेम से निर्मित सम्पूर्ण सृष्टि । जब तक हमारे केंद्र में प्रेम है तभी तक सृष्टि है।
           अंबर बोला "इंसान मिलन को प्रेम समझ बैठा है मानता ही नहीं प्रेम मिलन का पर्याय नहीं है प्रेम तो अनंत है। मिलन को प्रेम समझने वाले ये नही समझ पाएंगे कि जहाँ मिलन वहां प्रेम की सीमा खत्म। तुम्हारा और मेरा प्रेम भी जब खत्म होगा वो पल प्रलय का होगा।"
           "क्षितिज केवल भ्रम है प्रेम में मिलन की अनिवार्यता का।"
           अब भी दोनों चल रहे हैं सतत सप्रेम और समर्पित आदि से अनंत तक प्रेम में समाहित साथ साथ।

प्रीति सुराना

Tuesday, 15 August 2017

ताली

'ताली'

        एक छोटी सी दुनिया थी जिसमें एक 'मैं' था दो 'तुम' थे और कुछ 'वो' थे । 'मैं' हमेशा दोनों तुम का हाथ थामकर चलता था। और दोनों तुम वो और वो अन्य वो के हाथ थामे हमेशा साथ रहकर सुख दुख बांटते थे। एक दिन दुनिया के सामने पहले तुम की उपलब्धि की घोषणा हुई।
     'मैं' जिसने अपनी ये छोटी सी खुशहाल दुनिया बनाई थी अति उत्साहित होकर ताली बजाने लगा।
और तुमने दूसरे तुम का हाथ थाम लिया और दुनिया खुशी में मैं को अकेला भूलकर आगे बढ़ गई।
        सुना है अब दोनों तुम हाथ थामकर चलते हैं। पर सब डरे डरे से रहते हैं, अब कोई किसी की उपलब्धि पर खुश होकर ताली नही बजाता।

प्रीति सुराना

Tuesday, 8 August 2017

परस्परोपग्रहो जीवानाम्

माता पिता ने जन्म दिया, पाला-पोसा,
और जीवन साथी के साथ विदा करते हुए कहा
हमारी परवरिश की लाज रखना
हमने जितना लाड़ प्यार तुम्हे दिया
उतना ही मान हमारा बढ़ाना।

गुरु ने शिक्षा दी, दिशा दी,
और पाठशाला से जाते समय कहा
कुम्हार की तरह ढाला है तुम्हें,
अब बदले में पाठशाला
और अपने गुरु का नाम रोशन करना।

बहन ने भाई की कलाई पर राखी बांधी
बदले में लिया आजीवन रक्षा का वचन
भाई ने भी राखी बंधवाकर कहा
बनाए रखना इस आंगन की रौनक
और देना बरकत की दुआएं।

जीवनसाथी ने लिए सात फेरे अग्नि के
और पत्नि ने मांग लिए सात वचन
सात वचनों के बदले पति ने मांग लिया
अंतिम एक वचन में ही पत्नि से
आजीवन सम्पूर्ण समर्पण।

बच्चों को संस्कार दिया, प्यार दिया,
भविष्य दिया
तो कुछ बनकर दिखाने की शर्त पहले रखी,
वहीं बच्चों ने कुछ कर गुजरने के लिए
मानसिक स्वतंत्रता के साथ
सुख सुविधाएँ मांग ली।

दोस्तों से की हर सुख-दुख की बात
दिया और लिया कदम-कदम पर साथ
बिन अपेक्षा दोस्ती का रिश्ता भी नही दिखा,
ये रिश्ता भी
प्रेम और विश्वास के आदान प्रदान पर ही टिका।

रिश्ते व्यापार नहीं जो समान लिया मूल्य दिया और बात खत्म
रिश्ते किराए का मकान नहीं
किराया चुकाया घर बदला
और अधिकार खत्म
रिश्ते राजनीति नहीं है
वोट मिले सीट मिली और मतलब खत्म।

गुप्त दान करने वाला भी चाहता है
बदले में पुण्य के लेखे में बढ़ोतरी।
ये निश्चित है बिन अपेक्षा तो
प्रकृति भी कुछ नही देती,
धरती को बीज दो तो ही अनाज मिलेगा।

पेड़ लगाओ को आकाश से पानी मिलेगा,
प्राकृतिक संपदाओं का संरक्षण और सुरक्षा करो
तो ही प्राणवायु , भोजन और जीवन संसाधन मिलेंगे,
सबको अपने किये के बदले
कुछ न कुछ प्रतिफल चाहिए

फिर क्यों अपेक्षा कि कर्म कर के याद मत रखो
मत करो प्रतिफल की अपेक्षा कभी किसी से तुमने कर्म का धर्म निभाया
मैनें तो नही पाया किसी को यहां निर्लिप्त।

'परस्परोपग्रहो जीवानाम्' 
जैन ग्रंथ, तत्त्वार्थ सूत्र का एक श्लोक है, जिसका अर्थ है
"जीवों के परस्पर में उपकार हैं
अर्थात सभी जीव एक दूसरे पर आश्रित है।

क्या आश्रित होकर अपेक्षा रहित होना आसान है,..
अपेक्षाओं का बिना कहे पूरा किया जाने की नीयत और नियति है
व्यवहार में आज के देश काल परिस्थिति में शायद नहीं
याद रहे पंचतत्व की शरण भी
प्राण देकर ही प्राप्त होती है।

प्रीति सुराना

औकात

ग़ज़ल

अंधियारों से जो डरती हो ऐसी कोई रात नहीं।
पीड़ा सहकर भी हँस लेना सबके बस की बात नहीं।।

मन का मालिक सुख-दुख सबकुछ बेमौसम अपनाता है।
धनवान भले हो कोई पर इतनी तो औकात नहीं।।

मन के सूखे आंगन में दो बूंदे बरसे आंसू की ।
कोई गैर कभी दे जाए ये ऐसी सौगात नहीं।।

मन को छलिया कहने वालों मन तो खुद को छलता है।
कोई अपना छल जाए तो और बड़ा आघात नहीं।।

मजहब की बातें जग में बस कड़वाहट फैलाती है।
तब मन सहता है जो पीड़ा उसकी कोई जात नहीं।।

लेखे आज नये नियमों से आय व्ययों  के कर डाले।
सब कुछ माप लिया है लेकिन सुख-दुख का अनुपात नहीं।।

रोज सियासत दिखलाती है सपनें सबको खुशहाली के।
खेल न जाने कैसा जिसमें शह तो है पर मात नहीं।।

मजबूर किया आज समय ने बेमतलब की चालों से।
घनघोर निराशा फैल रही बस में अब हालात नहीं।।

'प्रीत' घने पीड़ा के बादल मन के नभ पर छाये हैं।
बिन बादल के भी बरसे जो ऐसी तो बरसात नहीं।।

प्रीति सुराना

Sunday, 6 August 2017

*स्वागत और सम्मान*

जिस तरह
जन्म एक बार लिया
और
जीवन हर रोज जीया
मृत्युपर्यंत
हँसकर-रोकर
पाकर-खोकर,
पर जन्मदिन
सिर्फ एक दिन मनाकर
जीवन जीना तो नही छोड़ा,..
फिर क्यों विरोध
किसी खुशी के दिन
या पल के आयोजन का
कैसे कह दें
कि सिर्फ
आज मित्रता का,
आज महिला का,
आज पिता का
आज माँ का,
आज हिंदी का,
आज आज़ादी का,
आज संविधान का दिन कल सब शून्य????
जीते हैं हर पल
हर रिश्ता
हर भाव
हर खुशी
हर दुख
पर मनाकर एक विशेष दिन
अपनी भावनाओं की खुशी
देते हैं सम्मान
अपने रिश्तों और भावनाओं को,..
आज करती हूं सम्मान
अपने हर उस रिश्ते का
जिसमें
दोस्ती का भाव
अंशमात्र भी समाहित हो,..
करती हूं
खुश होने के हर मौके का
*स्वागत और सम्मान*

मित्रता दिवस की बधाई सभी मित्रों को,...

प्रीति सुराना

लेखा-जोखा

बड़े-बड़े सुख-दुख शब्दों में ढाल देती हूं,
जो पाया जीवन से लेखन में डाल देती हूं,
हर बड़े सबक का मैंने लेखा-जोखा रक्खा है,
छोटी-मोटी बातें तो हँसकर टाल देती हूं,...

प्रीति सुराना

Saturday, 5 August 2017

साधक की आत्मनिष्ठा

         सुबह सुबह मोबाइल घंटी बजी। सामने से आवाज़ आई,
       "हेलो! सुकृति मैम बात कर रही हैं?"
       "जी। कहिये।"
       "मैम सोशल साइट अर आपके बनाए कार्टून्स और शब्दचित्र देखे। बहुत ही बेहतरीन कलाकार हैं आप। क्या आप हमारी पार्टी के लिए काम करेंगी??"
        सुनकर सुकृति थोड़ी उत्साहित हो गई। और चहक कर पूछा,- मुझे क्या करना होगा।
        "आपको हमारी विरोधी पार्टी के नेताओं के कार्टून बनाकर उसपर हमारे निर्देशानुसार व्यंग्यात्मक टिप्पणियां लिखनी होगी जिससे विरोधी पार्टी की छवि खराब हो। आपको हर चित्र के लिए अच्छी राशि दी जाएगी। और आपका नाम भी पार्टी से जुड़ जाएगा।"
        कुछ पलों के लिए सुकृति स्तब्ध हो गई। सामाजिक कुरीतियों और बाल शिक्षा के लिए सालों से चल रही साधना छोड़कर पैसे के लिए दिशा बदलने की सोचकर ही मन धिक्कारने लगा।
        खुद को थोड़ा संभाला और सधे हुए शब्दों में कहा, "महोदय मैं नैतिक शिक्षा के चित्र अंकित करती हूं इस तरह राजनीति के लिए मैं अपनी कलम नहीं बेचूंगी, मुझे क्षमा करें ये एक *साधक की आत्मनिष्ठा* का प्रश्न है।"
         यह कहकर उसने लाइन काट दी और आज अपनी तूलिका पर नए चित्र के लिए मिली इस नई पृष्टभूमि पर काम शुरू कर दिया।

प्रीति सुराना

पथ की अशेषता

       सुधा के आंगन में कुछ फूलों के पौधे लगे हैं बहुत प्यार है उसे फूलों से। शशांक के जाने के बाद उसने यादों को फूलों के रंगों में जीना शुरू किया। बहुत सारे रंग जिंदगी के, यादों के, फूलों के।
   जीवनयापन के लिए शशांक की जगह अनुकंपा नियुक्ति में मिली शिक्षा विभाग की नौकरी स्वीकार कर ली। निःसंतान दंपत्ति में से कोई एक असमय चला जाए तो ,.. ? सोचकर रोंगटे खड़े हो जाते है हैं।
कोई प्रेम निभाना सुधा से सीखे। काम पर जाने से पहले और लौटकर शाम गहराने तक शशांक के पसंदीदा फूलों को बच्चों की तरह पालती।
       एक दिन सुबह सुबह माली सतरंगी फूलों वाला नया पौधा दे गया। समय के साथ वो बड़ा हुआ एक बहुत सुंदर सतरंगी फूल खिला। उसी इतवार छोटी बहन बच्चों के साथ घर आई। जाने कब बच्चों ने वो सतरंगी फूल तोड़ लिया। मेहमानों के जाने के बाद अगली सुबह अपनी दिनचर्या यथावत शुरू की । बगीचे में उस फूल को न पाकर विचलित हो गई।
        बहुत तड़पी बहुत रोई अगले कुछ दिन उसने उस एक फूल के लिए मातम में गुज़र दिए। 4-5 दिन बाद अचानक उसकी नजर पड़ी, जिस जगह से फूल तोड़ा गया था ठीक वहीं से कुछ छोटी छोटी संरचनाएं नज़र आ रही थी।
         अब सुधा ने एक नई ऊर्जा महसूस की। रोज पहले से ज्यादा उस पौधे का ध्यान रखने लगी अगले ही हफ्ते साथ छोटी छोटी शाखाएं पनपी और सात नए सतरंगी फूल।
      सुधा को लगा मानो उसकी सारी खुशियां कई गुना होकर लौट आई हो। साथ ही उसने अपने भीतर गज़ब का आत्मविश्वास महसूस किया। इन नवपल्लवित फूलों ने उसे *पथ की अशेषता* का आभास करवाया।
    
प्रीति सुराना

*साधक की आत्मनिष्ठा*

*साधक की आत्मनिष्ठा*

         सुबह सुबह मोबाइल घंटी बजी। सामने से आवाज़ आई,
       "हेलो! सुकृति मैम बात कर रही हैं?"
       "जी। कहिये।"
       "मैम सोशल साइट अर आपके बनाए कार्टून्स और शब्दचित्र देखे। बहुत ही बेहतरीन कलाकार हैं आप। क्या आप हमारी पार्टी के लिए काम करेंगी??"
        सुनकर सुकृति थोड़ी उत्साहित हो गई। और चहक कर पूछा,- मुझे क्या करना होगा।
        "आपको हमारी विरोधी पार्टी के नेताओं के कार्टून बनाकर उसपर हमारे निर्देशानुसार व्यंग्यात्मक टिप्पणियां लिखनी होगी जिससे विरोधी पार्टी की छवि खराब हो। आपको हर चित्र के लिए अच्छी राशि दी जाएगी। और आपका नाम भी पार्टी से जुड़ जाएगा।"
        कुछ पलों के लिए सुकृति स्तब्ध हो गई। सामाजिक कुरीतियों और बाल शिक्षा के लिए सालों से चल रही साधना छोड़कर पैसे के लिए दिशा बदलने की सोचकर ही मन धिक्कारने लगा।
        खुद को थोड़ा संभाला और सधे हुए शब्दों में कहा, "महोदय मैं नैतिक शिक्षा के चित्र अंकित करती हूं इस तरह राजनीति के लिए मैं अपनी कलम नहीं बेचूंगी, मुझे क्षमा करें ये एक *साधक की आत्मनिष्ठा* का प्रश्न है।"
         यह कहकर उसने लाइन काट दी और आज अपनी तूलिका पर नए चित्र के लिए मिली इस नई पृष्टभूमि पर काम शुरू कर दिया।

प्रीति सुराना

Friday, 4 August 2017

'मीठी नींद'

सागर किनारे बैठी
सहेजती
गीली रेत
निकालती हूँ उसमें से
छोटे जीव जंतु
कुछ शंख सीपियाँ
चमकीले पत्थर
और किस्मत से मिले
कुछ खरे मोती भी,..

बनाती हूँ
अपनी कल्पना से
सूझ बूझ से
हौसले से
हल्की थपकियों
और
स्निग्ध स्पर्श
रेत के छोटे छोटे घरौंदे
बिल्कुल आस पास,..

सजाती हूँ
उन घरोंदों को
सहेजे हुए सीपियों
शंखों पत्थरों
और मोतियों से
खास बात ये
कोई भी घरौंदा
बड़ा या महलनुमा नही
सब एक बराबर,..

एक ख्वाहिश सब मेरे आसपास हों
समानता, सहृदयता और सामंजस्य लिए
आपसी समझ और विश्वास आधार हो
पर अचानक उन घरोंदों से
निकल आते हैं छोटे-छोटे इंसान
मेरी नीयत पर लेकर बड़े बड़े सवाल
अविश्वास, तोहमतें, शिकायतें,
दरकार मेरे निःस्वार्थ होने के सबूत की
और मैं डर से कांप जाती हूँ,....

अचानक छटपटाती हूँ
महसूस करती हूं खुद को
अकेली, कमजोर, बेबस और डरी हुई,
जी करता है जोर से चीखकर पूछुं
यूँ तोहमतों पर मेहनत और समय बरबाद करने
या सब बना बनाया बिगाड़ने की बजाय
खुद क्यों नहीं बनाते कोई सुंदर जहान
पर आवाज़ निकलती ही नही
घुटती है अंदर तक सिर्फ मैं सुन पाती हूँ,...

और
घबराकर
पसीने से लथपथ
जाग जाती हूँ
टूट जाता है एक बुरा सपना
कई रातों से
जारी है ये *सिलसिला*
कई रातों से मैं सोई ही नहीं
मीठी नींद,..

प्रीति सुराना

Wednesday, 2 August 2017

क्या मैं सचमुच बुरी हूँ?

एक सवाल
क्या मैं सचमुच बुरी हूँ?
क्यों लोग अक्सर मतलब निकलते ही छोड़ जाते है?
या
इस तरह दरकिनार करते हैं
मानो कभी मेरी जरूरत थी ही नही,..।
कशमकश में हूँ
मैं कोई
सामान हूँ
रास्ता हूँ
या फिर इंसान?
ढूंढ रही हूं अपनी *पहचान*
मेरा एक रिश्ता आप से भी है,..।
करेंगे मदद मेरी ये जानने में,.
मैं कौन हूँ?
मैं क्या हूँ?
मैं कैसी हूँ?
आजकल महसूस करती हूं
अनचाहे ही
एक गैरजरूरी बुरी इंसान खुद को,..
जवाब के इंतज़ार में,..
(अभी-अभी)

प्रीति सुराना

जीना है

हर दर्द भुलाकर जीना है
सब डर मिटाकर जीना है
अब तो इरादा है पक्का
बस मुस्कुराकर जीना है

प्रीति सुराना

नीरव व्यथा


          सुनो मिताली! "तुमने मेरा बहुत साथ दिया मेरा। तुम्हारी दिखाई राह से आज मैं जिस मुकाम पर पहुंची हूँ वो सबको बता नही सकती। तुम समझ रही हो न बड़ी सोसायटी में बड़े लोगों की राजनीति बहुत चलती है। उस जगह खुद को स्थापित करना हो तो उनकी हां में हां मिलना ही पड़ता है। पर तुम आना जरूर तुम्हारा सम्मान इस तरह करवाउंगी कि तुमने सोचा भी नही होगा। बड़े बड़े लोगों से तुम्हारा परिचय होगा तो तुम्हारी पहचान भी बढ़ेगी।"
        ये सब सुनकर हतप्रभ मिताली ने अपने आंसू पोंछते हुए फोन रख दिया। नियत तिथि का रिजर्वेशन करवाकर नियत समय पर स्वास्थ्य को दरकिनार कर शालिनी के आयोजन में पहुंची। वादे के अनुसार समुचित सम्मान पाया पर बहन का स्नेह खोकर।
          हृदय छिन्नभिन्न हो गया जब किसी से शालिनी को ये कहते सुना कि "ये उन्नति सिर्फ और सिर्फ मेरे हुनर का कमाल है और इस सफलता का पूरा श्रेय  अपनी संस्था का नाम लेकर मिताली खुद लेना चाहती थी इसलिए आज से उससे सारे संबंध खत्म कर लिए।"
          इसे उन्नति कहूँ या सफलता या फिर मेरे लिए जीवन की एक नई सीख? यही नीरव व्यथा मन में लिए मिताली घर लौट आई ।
          उसने ऐसी ठोकरों से डरना सीखा ही नही बल्कि ये सबक उसकी उन्नति का महत्वपूर्ण पाठ बनेगा यह सोचकर आंसू पोंछ लिए।
खिड़की खोली तो देखा बादल छंट गए और सूरज मुस्कुरा रहा था।

प्रीति सुराना