Tuesday, 12 December 2017

*संस्कार*

हाथ में रिपोर्ट्स की फ़ाइल लिए गुमसुम आंखों में नमी लिए बैठी उत्तरा दरवाजे की घंटी बजते ही झट से फ़ाइल पलंग के सिरहाने में छुपाते हुए आँसू पोंछकर खुद को संभालते हुए उठ खड़ी हुई, मोहित ऑफिस से लौटा था, मुस्कुराते हुए स्वागत किया, और पानी देकर उसके लिए चाय बनाने चली गई।
चाय पीते हुए मोहित ने कहा 'मुझे तो तुम ठीक ठाक लग रही हो, पड़ोस वाले शर्मा जी की पत्नी अभी आते हुए लिफ्ट में मिली तो तुम्हारे स्वास्थ्य की चिंता जता रही थी। तुम्हे लोगों से सहानुभूति बटोरने के अलावा कुछ आता भी है?'
'तीन साल हुए शादी को घर बैठे नकारात्मक सोच के अलावा तुमने किया क्या है, कभी ये भी नहीं सोचती कि दिन भर का थका हारा आदमी घर पहुंचने से पहले ही तुम्हारे दुखड़े लोगों से सुने, मुझे और कोई काम नही है क्या ? पता नहीं इतने साल तुम्हारे घर वालों ने तुम्हे कैसे झेला होगा।'
रात का खाना जैसे तैसे बनाया, परोसा और आदतानुसार मोहित बिजली, फोन, सोसाइटी, मेंटेनेंस आदि के बिल थमाते हुए राशन-पानी तक कि जिम्मेदारी उत्तरा पर डालकर सोने के पहले ये भी कह गया कि जो भी तकलीफ हो जा कर अच्छे डॉ से मिल लो, मेरे पास हर जगह तुम्हारे साथ चलने का समय नहीं है और न रोज-रोज रोनी सूरत देखने का।
उत्तरा काम करना चाहती, पर मोहित का मानना था कि वो इतना कमाता है तो उत्तरा को काम करने की क्या जरूरत, घर के काम की मोहित के लिए कोई अहमियत नही की क्योंकि उसे लगता ये तो औरत का फर्ज है। मोहित को अभी बच्चा भी नहीं चाहिए क्योंकि अभी जिम्मेदारियों में फंसकर पदोन्नति में कोई रुकावट नही चाहता ।इसी तरह दिन बीतते रहे।
आज सुबह से मोहित के घर के सामने भीड़ लगी हुई थी, पूछने पर पता चला कल रात उत्तरा का देहांत हो गया।
पूरी जांच-पड़ताल के बाद पता चला कि गहन अवसाद का इलाज ले रही थी उत्तरा, उसकी डॉ ने बताया उत्तरा माँ बनना चाहती थी, मोहित से मिली उपेक्षा और माता-पिता के संस्कारों ने कभी ये इच्छा जताने की अनुमति नहीं दी। कभी हिम्मत करके मोहित से कहना चाहा तो उसने अनसुना कर दिया। तेज़ गुस्से के डर से कभी मोहित से खुलकर बात ही नहीं कर पाई।
मोहित सूना और अव्यवस्थित घर संभाल नही पा रहा था अब उसे उत्तरा के अकेलेपन और अपनी गलती का एहसास हुआ। मन ही मन सोच रहा था कि *ये कैसे संस्कार* कि पत्नी अपनी इच्छा पति से न कह सकी। और साथ ही कोस रहा था खुद के पुरुष होने के अहम रूपी कुसंस्कार को जिसने अपने गुस्से और व्यवहार से उत्तरा को दबाकर रखने की नीयत से कभी खुलकर कुछ बोलने ही नहीं दिया और उत्तरा संस्कारों की बली चढ़ गई और शेष रह गया सिर्फ एक पछतावा पर
*अब पछताए होत का जब चिड़िया चुग गई खेत*

प्रीति सुराना

Sunday, 10 December 2017

कोई नहीं

फिर अकेली खड़ी हूँ
एक ऐसे मोड़ पर
जहाँ रास्ते बहुत हैं
साथी कोई नहीं,..

पलकें बोझिल सी हैं
कितने सपनें लिए
घने अंधेरों का डर
रात सोई नहीं,..

घुट रहा मेरा मन
ये महसूस होता है
कहना चाहूँ मगर
बात कोई नहीं,...

उबल रहे हैं दर्द
पिघलना चाहते हैं
आँसू पी रही हूँ पर
आज रोई नही,..

प्रीति सुराना

Saturday, 9 December 2017

आखिर कब तक?

क्या हँसना और किस बात का रोना है,
हो ही जाता है जब-जब जो-जो होना है,
इंतज़ार क्यों, किसका, और आखिर कब तक?
जब ये भी तय है क्या पाना क्या खोना है,...

प्रीती सुराना

सिर्फ मेरे तुम

लिखूंगी आशाएं प्रेम सपनें तुम
लिखूंगी विश्वास साथ अपनें तुम
फिर सोचती हूँ क्यों लिखूं ये  सब
लिखूंगी मैं सिर्फ,.. *सिर्फ मेरे तुम*

प्रीति सुराना

Friday, 8 December 2017

बावफ़ा

मेरे दर्द की हद तक कभी आना
साथ प्यार और विश्वास भी लाना
मैं बावफ़ा रही जिंदगी से हर पल
जब ये जान लो तब लौटकर जाना,.. प्रीति सुराना

कर्तव्यपथ

कर्तव्यपथ

पेशानी पर सिलवटें
और
चेहरे की शिकन
मेरे भीतर चल रहे
द्वंद का दर्पण हो सकते हैं,.

मेरे माथे के बल
और
मेरे चेहरे की झुर्रियां
उम्र और अनुभवों का
लेखाजोखा हो सकती हैं,.

पर
आज भी
मन में हौसला
और आत्मविश्वास
मेरी वही पूंजी है,.

जिससे सांसों का व्यापार
बिना रुके चलता है,
मेहनत का प्रतिफल है
अपनों का प्रेम, विश्वास,
और सफलता का लाभ,.

हाँ!
हो जाती है
टूट-फूट, ह्रास-हानि भी
कभी-कभी
विश्वास से जुड़ी जो हैं सांसे,.

पर तुम विश्वास करो
तुम्हारा साथ
करता है भरपाई
तुम्हारा प्रेम हमेशा बनता है
'उत्प्रेरक',.

जो हारने नहीं देता
रुकने नहीं देता
और
मैं सतत रहती हूँ तत्पर
चलने को कर्तव्यपथ पर,..

प्रीति सुराना
08/12/2017

Monday, 4 December 2017

अनचाहा मौन

यादों का लिहाफ़ ओढ़े
अकेले बैठे
किसी कोने में,

जब भी चाहा
खुद को महसूस करना
सन्नाटे गूंजते हैं,

सरसराती हवाएँ सुखा जाती है
पलकों की कोर,
पर चुभती है पलकें देर तक,

छटपटाता है मन
कहने को बहुत कुछ
पर सुनेगा कौन?

तन्हाई बहुत तड़पाती है
डराता है
अनचाहा मौन,...

प्रीति सुराना

रामदुहाई

मौसम की शीतल पुरवाई
याद तुम्हारी लेकर आई
तुम बिन न दिन रैन कटे अब
विरहन की सुनो रामदुहाई

प्रीति सुराना

Sunday, 3 December 2017

छोटे-छोटे सपने

बातें नहीं है बड़ी-बड़ी
बस छोटे-छोटे सपने हैं,

कोई दुश्मन नहीं है लेकिन
गिनती के ही अपने हैं,

लाग-लपेट नहीं जानूँ
कोई भी छल जाता है,

तय है पल प्रतिपल जीवन के
संघर्षों में ही खपने हैं।

प्रीति सुराना

नियति इस प्रेम की,...

तुम्हारा आक्रोश
पल-पल झलकाता है
तुम्हें नहीं चाहिए बंधन
चाहे प्रेम के ही क्यूं न हों,..

हर बार मेरा
सहमकर रो पड़ना,
बार-बार याद दिलाया जाना
मुझे मेरी लक्ष्मणरेखा,..

फिर भी
स्वीकार
सबकुछ
प्रेम में भय ही क्यों न हो,..

हाँ! मैं डरती हूँ तुमसे,
बहुत, बहुत ज्यादा,
पर करती हूं विश्वास
प्रेम से भी ज्यादा,...

फिर
नियति
इस प्रेम की
जो हो सो हो,... प्रीति सुराना

मेरे दोनो पैर

मेरे दोनों पैर

एक दुर्घटना
और
संवेदनशून्य हुए
मेरे दोनों पैर
असहाय, असहज और अनुपयोगी
और
बोझ सा लगता जीवन,..

अंतस में खुद को टटोलकर देखा
बची-खुची खुरचन सी थी
कुछ संभावनाएँ
सारी खुरचन को समेटकर
ले आई अंतस के उस कोने में
जहाँ सहेज रखा था बचपन से
थोड़ा-थोड़ा करके ढेर सारा
आत्मविश्वास,..

उठी,
उठकर खड़ी हुई,
कोशिश की,
असहनीय पीड़ा को सहकर
कदम बढ़ाने की
पहली ही बार मे गिर पड़ी,
फिर उठी एक ज़िद के साथ
चली कुछ कदम,..

लोगों ने बढ़ाए हाथ
स्वार्थ, सुविधाएं, सहानुभूति, तरस की
कई-कई बैसाखियाँ और सीढियाँ बनकर,
सब को नकार कर बढ़ी
लड़खड़ाते कदमों से,
डगमगाया कई बार मेरा आत्मविश्वास,...

मन ने कहा
ये ज़िद क्यों?
ले लो सहारा
और बढ़ जाओ आगे,
जी लो कुछ पल
पर आत्मसम्मान रोक देता
सख़्ती से हर बार,..

जब-जब वेदना के स्वर निकले हौले से,
बनी उपहास का पात्र भी,
जब-जब मन की मौन चीख से उभरी
मेरे चेहरे पर पीड़ा की लकीरें,
हँसते देखा अपने ही पीछे अपनों को,
पीड़ा के उबालपर वाष्पित होकर
पलकों से ढुलक आई अश्रुधारा को देख
लोगों ने कहा कमजोर मुझे,..

किसी ने नहीं देखी वो पीड़ा
जो भीतर कहीं मुझे निचोड़ रही थी,
खैर!
बढ़ती रही,
उठती-गिरती,
लड़खड़ाती हुई,
ऊबड़खाबड़ रास्तों पर भी संभलकर,..
कई बार मिले सपाट धरातल भी पर
फिसलन के भय के साथ,...

चलते-चलते एक दिन महसूस किया
चल रही हूं
हर पीड़ा के साथ
और एक पल को लगा
तुम्हारे कदम मेरे बराबरी पर आ रुके
मधुर स्मित के साथ किया दोनों ने अभिवादन
और मौन ही दी स्वीकृति साथ चलने की,..

लेकिन
तुम्हारी गति तेज थी
मैं नहीं कर पाई बराबरी
पर रुकी नहीं,
न चाहा कि रोक लूं तुम्हें अपने साथ,
चल रही हूं अब भी धीरे-धीरे
सधे कदमों से,..
माना
नियति है घाव पर ही लगती है
चोट बार-बार, हर बार,
पर अब डाल रही हूं आदत धीरे-धीरे,..

सच हो रही है अब
सुखद अनुभूति
लौट रही है
संवेदनाएं
संवेदनशून्य मेरे दोनों पैरों में
चल रही हूं
एक बार फिर
अपने पैरों पर,...

सुनो!
न थी, न है, न कभी होगी जरूरत
कभी किसी सहारे या सहानुभति की,..
तुम बनना मेरे वही दो पैर
हाँ!
मेरे दो पैर
प्रेम और विश्वास,...।

प्रीति सुराना

मैं सिर्फ एक देह नहीं हूं

मैं सिर्फ एक देह नहीं हूं,
देह के भीतर एक मन भी है
जिसमें टीसते हैं वो ज़ख्म
जो किसी को दिखाए नही जाते,..

प्रीति सुराना

दहशत

दहशत और मोहब्बत का
अटूट नायब रिश्ता आज जाना
मोहब्बत को खो देने से ज्यादा
दहशत की और कोई बात नही,..
प्रीति सुराना

भयावह

मैं अकेले ही ठीक थी, असफल और हारी हुई सी,
मगर भीड़ में अपने ही आत्मसम्मान को खोकर,
आज लग रहा है सफलता का शिखर सबसे भयावह
और आज यकीनन जीतकर भी मैं पूरी तरह हार गई
प्रीति सुराना

समझो

तुम्हारी चाहत है तुम कहो और मैं सबकुछ सुनूँ
मेरी हसरत है मैं चुप रहूँ और तुम मुझे समझो
प्रीति सुराना

गुम

मैं खुद को ढूंढती हुई जाने कब गुम हो गई
हम होने की ख्वाहिश थी पर सिर्फ तुम हो गई
प्रीति सुराना

Friday, 1 December 2017

कश्मीर की वादियां

कश्मीर की वादियां

कश्मीर के जर्रे जर्रे में बसा है प्रेम,
उस प्रेम को दहशत में बदल दिया है
सियासती चालों
और अनावश्यक पहरेदारियों ने,..

चश्मेशाही गवाह है
यहां पत्थरों से भी रिसता है प्रेम का अमृत
जो बुझा सकता है *प्यास*
हर मायूस रूह की,..

तभी तो है कश्मीर की मेहमान नवाज़ी में
जाफ़रानी कहवा,
जो बिखेरता है खुशबू
सिर्फ और सिर्फ मुहब्बत की,..

चिनार और देवदार से एक आच्छादित जमीन,
और पहाड़ों की चोटियों पर झुकता हुआ आसमान,
कौन कहता है कि इन वादियों में घुला है ज़हर आतंक का?
सच सिर्फ इतना है कि प्रेम में पगे है यहाँ के इंसान,..

नज़र उतारनी होगी धरा के स्वर्ग की
और मिटाना होगा आतंक का खौफ़
फिर से खिल उठे देवदार, चिनार और जाफ़रान
तभी गर्व से सिर उठाकर जी सकेगा हिंदुस्तान।

प्रीति सुराना