Friday, 28 July 2017

में बहुत छोटी हूँ

मैं बहुत छोटी हूँ

शायद इसलिये
छोटी छोटी खुशियों में
बहुत खुश हो जाती हूँ,..
और छोटे छोटे दुखों में
बहुत दुखी हो जाती हूँ,..

ऐसा नहीं है कि
मैं बड़ी नही होना चाहती
*सवाल* ये है कि
मैं बड़ी होउंगी
तो क्या खुशियाँ भी बड़ी होंगी,..?

अगर हाँ,
तब तो बहुत अच्छा होगा
पर इस डर का क्या करूँ
कि तब दुख भी
बड़े-बड़े होंगे,..

ना ना!!

मुझे नही होना बड़ा
मैं ठीक हूं
अपनी छोटी सी दुनिया
अपनी छोटी सी पहचान
अपने छोटे छोटे सुखों में,..

बहुत आसानी से
पार कर लेती हूं
अपनों का हाथ थामकर
छोटे छोटे पड़ाव सुख-दुख के,
और यही मेरी सबसे बड़ी खुशी है,...

हाँ!
मैं सचमुच खुश हूं,...

प्रीति सुराना

Monday, 24 July 2017

रीतापन

कभी नहीं होता
बनावटीपन
मेरे प्यार में
मेरे अपनेपन में
मेरे गुस्से में
मेरी ज़िद में,..

सच कहती हूँ
साफ कहती हूँ
जहाँ कहना मुमकिन नही
वहाँ अकसर चुप रहती हूं,
तड़प कर रोती हूँ
कभी आपा खोती हूँ,..

मैं लड़तीं हूँ अपनों से ही
हक़ से हक़ के लिए
नफरतों को मन में पाला ही नही
जिसने मान लिया
मुझे अपना प्रतिद्वंदी या दुश्मन
उसे भी दी हमेशा दुआ,..

जो है वही है कोई दिखावा नहीं
जो मन मे होता है
बस वही कहती हूँ
पर करती हूं स्वीकार
बस एक जगह होता है झूठ
वो भी सिर्फ मेरी मुस्कान के पीछे,..

मेरे अंतस का नितांत अपना
वो कोना
जिसका रीतापन
घूंट घूंट पीये हुए आंसुओ से भिगोती हूँ
सब को देखकर मुस्कुराती हूँ
और उस कोने में सुबककर रोती हूँ,..

हाँ !!!
जब जब मैं भीड़ में भी तन्हा होती हूँ,.. प्रीति सुराना

Saturday, 22 July 2017

आंख का तिल

सुना था
सौंदर्य में
तिल का
बहुत महत्व होता है
मैं तो सुंदर भी नहीं
पर
मेरी आँखों की
गहराई में छुपा तिल
मेरी आँखों को
और गहरा करता है
ये तुम्ही ने बताया था
एक दिन,...

और तभी
घंटों आईने के सामने खड़ी
कभी आंखों की गहराई में
तुम्हारे लिए प्रेम
कभी सपनें
कभी शिकायतें
कभी आंसुओं के बीच
करती रही तुलना
आंख की पुतली के नीचे
इधर उधर डोलते तिल से,..
जिसे इससे पहले
मैंने कभी देखा ही नही था,..

और
आज जब
तुम
तृप्त हो प्रसिद्धि से,
खुश हो सफलता से,
व्यस्त हो ज़िंदगी में
घिरे हो भीड़ में,
तब मैं
खुद को
महसूस कर रही हूं
तुम्हारी
आंख के तिल सा,..

सुनो!

बहुत कोशिश की
आंसुओं में बहा दूँ तिल को
पर संभव ही नही हुआ,..
तुम्हें
खुद से बेखबर देखकर
सोचती हूं
क्या सचमुच मैं हूं भी
तुम्हारे जीवन का सौंदर्य
या ये भी
महज़ गलतफहमी है मेरी
कि हूँ मैं
तुम्हारी आंख का तिल,....

प्रीति सुराना

Friday, 21 July 2017

उलझन

उलझन (डमरू घनाक्षरी)

सह मत डरकर
लड़ अब डटकर
मत रह बच बच
सच कह रट पट

तन मन धन सब
रख अब सम कर
अहम वहम तज
बस कर खटपट

ठहर ठहर चल
बह मत जल सम
वजन वहन कर
चल मत सरपट

उलझन मन भर
हर पल हर घर
अब हर नटवर
सब डर झटपट

प्रीति सुराना

Thursday, 20 July 2017

*भाव पल्लवन:- हर पल यहां जी भर जियो,... कल हो न हो।*

     *आज के गद्य विशेषांक में* सिर्फ *मन की बात*, क्योंकि *कल मैं रहूं न रहूं,...*
   हाँ! मैं जीती हूँ जिंदगी ऐसे जैसे जो है आज है अभी है जाने कल हो न हो। और ये सोच और विचारों का ये सिलसिला उस दिन शुरू हुआ जिस दिन गहरी बेहोशी के बाद अपने बच्चों का उदास चेहरा सामने देखा। उस पल से अपनी शारीरिक पीड़ाओं और अक्षमताओं को भूलकर सिर्फ ये याद रखा कि *जिंदगी दोबारा नही मिलेगी इसे आज ही जीना है।*
      कई लोगों को देखा है किसी बीमारी से उबर भी गए तो उसके सदमे से नही उबर पाते, कई लोगों की सोच ये भी है की जिंदा हो तो ऐश कर लो, बिना किसी लक्ष्य बिना किसी उद्देश्य तन मन और धन के सुख ही सब कुछ हैं। पर नही,... मैंने अपनी हर विकट परिस्थिति के बाद खुद को और अधिक सक्रिय किया ऐसे कार्यों के लिए जिसमें सिर्फ मेरा सुख नही था, *न तन न धन जो किया समर्पण के भाव से सिर्फ मन की संतुष्टि को ध्यान में रखते हुए।*

*मेरी बस इतनी सी चाहत है*
*कुछ ऐसा करुं मरने से पहले*
*जो लोग आज हंसते हैं मुझ पर*
*वो भी रोएं मेरी अर्थी पर,...*

     पर ये सोच भी हमेशा चलती रहती है मन में कि कुछ भी ऐसा न करुं कि मेरे बाद किसी का नुकसान हो या किसी का कोई भी काम रुक जाए। हर रोज एक रूपरेखा सिर्फ आज के कामों की जो अधूरा रहे तो इतना ही कि कोई और पूरा कर सके। कोई एकछत्र राज वाली कार्यप्रणाली नही सबको जो आज सिर्फ मेरा दिखता है कल मेरे न होने पर भी सुचारू रूप से जारी रहेगा। घर-परिवार, व्यापार-व्यवहार, सपने-लक्ष्य, सब सतत रहेंगे मेरे बाद भी क्योंकि *खुले पन्नों की किताब सा जीवन अंतिम पृष्ठ तक पढ़ा जा सकेगा ।*
       बात सिर्फ इतनी सी कि संस्कार और व्यवहार ऐसा बनाने की कोशिश कर रही हूँ कि मेरे बाद भी मुझे याद रखा जाए पूरी दुनिया में न सहीं मेरे अपनों की दुनिया में जहाँ कुछ को अच्छी कुछ को बुरी लगती हूँ अपनी अपनी अपेक्षाओं के हिसाब से। *इसलिए किसी के दिल मे किसी के दिमाग मे किसी की नज़र में किसी के नज़रिये में जीवित रहूंगी ये उम्मीद करती हूं।*
       साथ ही अपने कार्य अपनी कार्यशैली और अपना कार्यक्षेत्र इस तरह संचालित किया कि जो भी है वो मेरे बाद कोई और संभाल सके। घर में पति और बच्चे , परिवार में छोटे और बड़े, व्यापार में देनदार और लेनदार, व्यवहार में अपने और पराए, सपनों में सामर्थ्य और प्रयास, लक्ष्य में सिर्फ आज और आज में किसी का अहित न करने की भावना इन सब में सामंजस्य बनाए रखते हुए जब तक हूँ तब तक इसी सोच और सामंजस्य को कायम रखते हुए मन की संतुष्टि के लिए पूर्णतः समर्पित होकर *वही कार्य करना जिससे किसी को हानि न पहुँचे ।*
       इस बात पर अटूट विश्वास रखती हूं कि *एक पल का भरोसा नहीं जो है आज है अभी है* इसलिए मेरा किसी पर प्यार या विश्वास, किसी से गुस्सा या लड़ाई और तो और किसी सपनें को पूरा करने के लिए पहला कदम, गलती की क्षमा मांगने की पहल, किसी की प्रशंसा किसी की गलती पर प्रतिक्रिया सब कुछ आज और अभी,.... *हर पल यहां जी भर जियो,... कल हो न हो।*

*प्रीति सुराना*

Tuesday, 18 July 2017

अस्तित्व

        बिंदु चुपचाप अकेली उदास बैठी थी और आकृति कुछ दूर खड़ी उसे उपेक्षित और व्यंग्यात्मक नज़रों से देख रही थी। अचानक बिंदु नज़र आकृति से मिली और उसे गुस्सा आ गया।
           बिंदु ने इशारे से अपनी परम मित्र को कुछ कहा जो आकृति में शामिल थी और उसने अपने बाजू वाली और उसकी बाजू वाली ने अपने बाजू ये बात कानों ही कानों में कह डाली। सब एक दूसरे से इशारों में ही बात करती रहीं और आकृति बिल्कुल बेखबर रही।
     कुछ ही देर में इशारों और कानाफूसी का नतीजा ये हुआ कि कई गुट बन गए सब अपनी जगह छोड़कर अलग अलग समूहों में इकट्ठे होने लगे। कई छोटी-छोटी नई आकृतियां निर्मित हो गई।
      मूल आकृति अपने क्षतविक्षत अस्तित्व को समेटने लगी तो पाया उसका मौलिक स्वरूप ही खत्म हो गया।
       अब दूर खड़ी बिंदु मुस्कुरा रही थी उसे देखकर क्योंकि उसके एक  इशारे से पूरा माहौल बदल गया।
      कुछ देर बाद उसने महसूस किया कि उसे तो किसी समूह ने जोड़ा ही नही और एक पल में ही उसे अपनी गलती का अहसास हो गया और अचानक वह सुबककर रो पड़ी।
       उसे रोते देखकर आकृति उसके पास आई और उसे गले से लगाकर बोली, मुझे माफ कर दो मैंने तुम्हारे अस्तित्व पर उपहास न किया होता तो ये नौबत नहीं आती।
        आज हम दोनों दुखी इसलिए है क्योंकि मैंने बिंदु के अस्तित्व की उपेक्षा की और तुमनें भीड़ में किसी एक पर विश्वास करके अपनी कमजोरी कह दी। तुम्हारी कमजोरी और मेरी मूर्खता का परिणाम अलगाव और बिखराव है जिसके कारण बिंदु और आकृति दोनों ही एक दूसरे के बिना अस्तित्व खो बैठे।
         दूर खड़े नए बने अनेक गुटों ने ये पुनर्मिलन देखा और बातें सुनी। कुछ समझे कुछ अहम के चलते समझ कर भी न समझे कुछ नासमझ अपने साथियों की समझ पर निर्भर रहे। इस तरह जो आकृति के पास वापस लौटे उन्होंने बिंदु के निर्देश पर स्थान ग्रहण किया। आकृति छोटी ही सही पर मूल रूप में लौटी।
         बिंदु और आकृति ने एक दूसरे के अस्तित्व का सम्मान करना सीख लिया। बिंदु के नेतृत्व में आकृति का आकार पहले से अधिक सुदृढ़ और सुंदर हो गया। दोनों की प्रतिबद्धता ने कई नए आयाम स्थापित किये।

प्रीति सुराना

Sunday, 16 July 2017

बुआ जी *विमला देवी कांकरिया* को विनम्र श्रद्धांजलि👏

ॐ शांति

पीकर वेदना का गरल
जीना न था सहज सरल
अपनी अंतिम सांसों तक
संयमित पर जल सी तरल

प्रीति समकित सुराना